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मुझे पता है कि मेरी गलती हुई है और शायद सामने वाले को मेरी माफी की जरूरत भी है। लेकिन जब उसके सामने जाने का समय आता है तो अहंकार, शर्म और डर सब एक साथ आ जाते हैं। मैं सच में माफी मांगना चाहता हूँ, लेकिन शुरुआत कैसे करूँ?
श्लोक
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।63।।
krodhād bhavati sammohaḥ sammohāt smṛiti-vibhramaḥ smṛiti-bhranśhād buddhi-nāśho buddhi-nāśhāt praṇaśhyati
श्रीमद्भगवद्गीता · 2.63
चौपाई / दोहा
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥
moha sakala byadhinha kara mula, tinha te puni upajahin bahu shula
अर्थ
मोह ही सब रोगों की जड़ है, उसी से अनेक पीड़ाएँ जन्म लेती हैं। पकड़ ढीली होते ही दुःख हल्का होने लगता है।
श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड
कथा
सुदामा: जब गरीबी दोस्ती के सामने छोटी पड़ जाए
सुदामा के घर में पैसे नहीं थे।
पत्नी और बच्चे थे।
कई बार खाने तक की चिंता रहती थी।
एक दिन पत्नी ने कहा —
"आपके बचपन के मित्र कृष्ण अब द्वारका के राजा हैं।
उनसे मिलने क्यों नहीं जाते?
"
सुदामा को यह बात अच्छी नहीं लगी।
किसी पुराने दोस्त से मिलने जाना अलग बात है।
मदद मांगने जाना अलग।
उन्हें डर था कि कहीं कृष्ण के सामने जाकर उन्हें अपने घर की गरीबी बतानी न पड़े।
लेकिन घर की हालत देखकर आखिर वे निकल पड़े।
साथ में देने के लिए कुछ खास था भी नहीं।
पड़ोस से मिले थोड़े से चावल एक छोटी पोटली में बांध लिए।
द्वारका पहुंचकर सुदामा को अपने कपड़ों और अपनी हालत पर संकोच हुआ।
वे सोच रहे थे —
"क्या मैं सच में इस राजमहल में जा सकता हूं?
"
लेकिन जैसे ही कृष्ण को पता चला कि सुदामा आए हैं, वे खुद उन्हें लेने दौड़ पड़े।
दो पुराने दोस्त मिले।
राजा और गरीब ब्राह्मण नहीं।
बस दो दोस्त।
कृष्ण ने सुदामा को गले लगाया।
उनके पैर धोए।
उनसे बातें कीं।
सुदामा अपने साथ लाई हुई छोटी-सी पोटली छिपाने लगे।
उन्हें शर्म आ रही थी कि इतने बड़े राजा के सामने यह क्या लेकर आए हैं।
लेकिन कृष्ण ने उसे प्रेम से स्वीकार किया।
दोनों ने पुरानी बातें कीं।
हंसे।
बचपन याद किया।
सुदामा अपनी परेशानी पूरी तरह कह नहीं पाए।
फिर वे वापस लौट गए।
उन्हें लगा कि वे कुछ मांगकर नहीं आए।
लेकिन घर पहुंचने पर सब बदल चुका था।
जहां उनकी झोपड़ी थी, वहां समृद्धि थी।
पर कहानी का असली अर्थ महल नहीं है।
असली बात यह है कि सुदामा को अपने दोस्त के सामने अपनी गरीबी छिपाने की जरूरत नहीं थी।
सच्चे रिश्ते में हमेशा बराबरी पैसे से नहीं होती।
Linked wisdom: Srimad Bhagavatam, Canto 10; needs citation-level verification | Evidence: traditional | Topics: आर्थिक संकट, पैसे की तंगी, दोस्ती
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “मुझे पता है कि मेरी गलती हुई है और शायद सामने वाले को मेरी माफी की जरूरत भी है।
लेकिन जब उसके सामने जाने का समय आता है तो अहंकार, शर्म और डर सब एक साथ आ जाते हैं।
मैं सच में माफी मांगना चाहता हूँ, लेकिन शुरुआत कैसे करूँ?
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — मोह ही सब रोगों की जड़ है, उसी से अनेक पीड़ाएँ जन्म लेती हैं।
पकड़ ढीली होते ही दुःख हल्का होने लगता है।
इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है — कभी-कभी हमारी आर्थिक स्थिति हमें लोगों से दूर कर देती है।
हम सोचते हैं कि हमारे पास देने को कुछ नहीं है।
लेकिन रिश्ते हमेशा चीज़ों से नहीं चलते।
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।
इस अनुभव से एक बात सामने आती है
कभी-कभी हमारी आर्थिक स्थिति हमें लोगों से दूर कर देती है। हम सोचते हैं कि हमारे पास देने को कुछ नहीं है। लेकिन रिश्ते हमेशा चीज़ों से नहीं चलते।
ऐसे ही कुछ और अनुभव
- “हालात लगातार खराब हो रहे हैं। पैसे की चिंता है, घर में भी सब कुछ ठीक नहीं चल रहा और कई बार लगता है कि अब कुछ अच्छा होने वाला ही नहीं है। फिर भी अंदर कहीं एक छोटी-सी उम्मीद बची रहती है। क्या यह उम्मीद रखना सही है या मैं खुद को धोखा दे रहा हूँ?”
- “मैं कई बार उम्मीद लगाकर टूट चुका हूँ। हर बार सोचता हूँ कि इस बार शायद सब ठीक होगा, फिर कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है कि निराश होना पड़ता है। फिर भी कुछ दिनों बाद मैं दोबारा उम्मीद करने लगता हूँ। क्या यह मेरी कमजोरी है या मेरे अंदर की कोई ताकत?”
क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
