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यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है

मैंने अपनी तरफ से जितना कर सकता था उतना किया। अब परिणाम मेरे हाथ में नहीं है, लेकिन मन बार-बार उसी के बारे में सोचता रहता है---क्या होगा, कब होगा, मेरे साथ क्या होगा। कोशिश करने के बाद परिणाम छोड़ देना आखिर कैसे सीखा जाए?

श्लोक

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।7।।

yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata abhyutthānam adharmasya tadātmānaṁ sṛjāmyaham

श्रीमद्भगवद्गीता · 4.7

चौपाई / दोहा

कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥

kadara mana kahun eka adhara, daiva daiva alasi pukara

अर्थ

कायर और आलसी मन का एक ही सहारा होता है — भाग्य को दोष देना। साहस कर्म से आता है, प्रतीक्षा से नहीं।

श्रीरामचरितमानस · बालकाण्ड

कथा

मार्कण्डेय: जब मृत्यु का डर सामने हो

मार्कण्डेय के बारे में बचपन से ही कहा गया था कि उनकी आयु केवल सोलह वर्ष की होगी।

कल्पना कीजिए।

जब दूसरे बच्चे भविष्य के बारे में सपने देख रहे हों, तब आपको पता हो कि आपकी जिंदगी बहुत छोटी है।

उनके माता-पिता भी इस बात से दुखी थे।

लेकिन मार्कण्डेय ने अपने जीवन को सिर्फ डर के हवाले नहीं किया।

जैसे-जैसे सोलहवां वर्ष करीब आया, उनकी शिव भक्ति और गहरी होती गई।

फिर वह दिन आया।

मार्कण्डेय शिवलिंग के सामने बैठे थे।

और तभी यमराज उनके सामने प्रकट हुए।

मृत्यु सामने थी।

कहानी के अनुसार, मार्कण्डेय ने शिवलिंग को पकड़ लिया।

यमराज ने अपना पाश फेंका।

पाश शिवलिंग को भी छू गया।

और फिर भगवान शिव प्रकट हुए।

मार्कण्डेय बच गए और उन्हें दीर्घ जीवन का वरदान मिला।

इस कथा को चाहे जिस रूप में समझें, इसमें एक बहुत मानवीय बात है।

डर के कारण जिंदगी रोक देना और मृत्यु की वास्तविकता को स्वीकार करके आज को अर्थपूर्ण बनाना दोनों अलग बातें हैं।

हममें से बहुत लोग भविष्य की चिंता में आज का दिन खो देते हैं।

"अगर बीमारी हो गई तो?

"

"अगर कुछ हो गया तो?

"

"अगर मैं मर गया तो?

"

इन सवालों का कोई अंत नहीं।

मार्कण्डेय की कहानी हमें यह नहीं कहती कि मृत्यु के बारे में कभी मत सोचो।

वह हमें यह सोचने देती है

जब मृत्यु निश्चित है, तब आज कैसे जीना है?

Linked wisdom: Markandeya Purana / Shiva Purana — needs citation-level verification | Evidence: traditional | Topics: मृत्यु का भय, आस्था, स्वास्थ्य संकट

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “मैंने अपनी तरफ से जितना कर सकता था उतना किया।

अब परिणाम मेरे हाथ में नहीं है, लेकिन मन बार-बार उसी के बारे में सोचता रहता है---क्या होगा, कब होगा, मेरे साथ क्या होगा।

कोशिश करने के बाद परिणाम छोड़ देना आखिर कैसे सीखा जाए?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है कायर और आलसी मन का एक ही सहारा होता है भाग्य को दोष देना।

साहस कर्म से आता है, प्रतीक्षा से नहीं।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है भविष्य हमारे हाथ में पूरी तरह नहीं है।

लेकिन आज का दिन किस तरह जीना है, यह कुछ हद तक हमारे हाथ में है।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

भविष्य हमारे हाथ में पूरी तरह नहीं है। लेकिन आज का दिन किस तरह जीना है, यह कुछ हद तक हमारे हाथ में है।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक