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लोग कहते हैं आत्मा अमर है, लेकिन मुझे समझ नहीं आता कि यह आत्मा असल में है क्या और मुझसे कैसे अलग है?

श्लोक

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।62।।

dhyāyato viṣhayān puṁsaḥ saṅgas teṣhūpajāyate saṅgāt sañjāyate kāmaḥ kāmāt krodho 'bhijāyate

श्रीमद्भगवद्गीता · 2.62

चौपाई / दोहा

बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥

binu satasanga bibeka na hoi, Rama kripa binu sulabha na soi

अर्थ

सत्संग के बिना विवेक नहीं जागता। उलझन में अकेले मत बैठिए — सच्चे लोगों का साथ ही रास्ता खोलता है।

श्रीरामचरितमानस · बालकाण्ड

कथा

राम का वनवास: जब जीवन अचानक आपकी योजना बदल दे

अयोध्या में उत्सव की तैयारी थी।

राम का राज्याभिषेक होने वाला था।

शहर सज चुका था।

लोग खुश थे।

राम स्वयं भी उस समय यह सोच रहे होंगे कि अब जीवन एक नए चरण में प्रवेश करेगा।

लेकिन उसी रात सब बदल गया।

कैकेयी ने दशरथ से अपने पुराने दो वरदान मांग लिए।

पहला राम को चौदह वर्ष का वनवास।

दूसरा भरत को राजगद्दी।

दशरथ टूट गए।

जिस बेटे का राज्याभिषेक होने वाला था, उसी बेटे को अगले दिन वन भेजना था।

जब राम को यह बात बताई गई, तो उनके सामने बहुत सारे रास्ते थे।

वे विरोध कर सकते थे।

वे कह सकते थे कि यह अन्याय है।

वे प्रजा से समर्थन मांग सकते थे।

लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

उन्होंने बस पिता के वचन को देखा।

और कहा

"यदि यह पिताजी का वचन है, तो मैं वन जाऊंगा।

"

इसके बाद सीता ने कहा कि वे भी साथ जाएंगी।

लक्ष्मण भी साथ चल पड़े।

और जिस व्यक्ति के लिए अगले दिन राजतिलक होना था, वह उसी रात राजमहल छोड़कर वन की ओर निकल गया।

मुझे इस कहानी में सबसे मानवीय बात यही लगती है।

कई बार हमारी जिंदगी भी ऐसी ही होती है।

हमने कुछ सोचा होता है।

हमने योजना बनाई होती है।

हमें लगता है अब सब ठीक हो जाएगा।

और फिर अचानक कोई फोन आता है।

कोई नौकरी चली जाती है।

कोई रिश्ता टूट जाता है।

कोई बीमारी सामने जाती है।

कोई ऐसा फैसला हो जाता है जो हमारे हाथ में नहीं था।

हमारे पास दो रास्ते होते हैं

या तो हम लगातार यही सोचते रहें कि "ऐसा मेरे साथ क्यों हुआ?

"

या फिर यह पूछें

"अब इस परिस्थिति में मेरा सही अगला कदम क्या है?

"

राम की कहानी हमें दूसरा रास्ता दिखाती है।

Linked wisdom: Valmiki Ramayana / Ramcharitmanas, Ayodhya Kand; needs citation-level verification | Evidence: traditional | Topics: कर्तव्य, रिश्तों का बोझ, परिवार का दबाव

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “लोग कहते हैं आत्मा अमर है, लेकिन मुझे समझ नहीं आता कि यह आत्मा असल में है क्या और मुझसे कैसे अलग है?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है सत्संग के बिना विवेक नहीं जागता।

उलझन में अकेले मत बैठिए सच्चे लोगों का साथ ही रास्ता खोलता है।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है हर परिस्थिति हमारे अनुसार नहीं बदलेगी।

लेकिन परिस्थिति बदलने के बाद हम कैसे खड़े होते हैं, यह बहुत हद तक हमारे हाथ में रहता है।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

हर परिस्थिति हमारे अनुसार नहीं बदलेगी। लेकिन परिस्थिति बदलने के बाद हम कैसे खड़े होते हैं, यह बहुत हद तक हमारे हाथ में रहता है।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक