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जब मैं शीशे में खुद को देखता हूँ, तो जो दिखता है वो शरीर है। तो फिर मैं जिसे "मैं " कहता हूँ, वो कौन है?
श्लोक
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।63।।
krodhād bhavati sammohaḥ sammohāt smṛiti-vibhramaḥ smṛiti-bhranśhād buddhi-nāśho buddhi-nāśhāt praṇaśhyati
श्रीमद्भगवद्गीता · 2.63
चौपाई / दोहा
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥
moha sakala byadhinha kara mula, tinha te puni upajahin bahu shula
अर्थ
मोह ही सब रोगों की जड़ है, उसी से अनेक पीड़ाएँ जन्म लेती हैं। पकड़ ढीली होते ही दुःख हल्का होने लगता है।
श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड
कथा
एकलव्य: जब दरवाजा बंद हो, तो अपना रास्ता बनाना
एकलव्य धनुर्विद्या सीखना चाहता था।
उसकी इच्छा थी कि वह द्रोणाचार्य से शिक्षा ले।
वह उनके पास गया।
लेकिन उसे शिष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया गया।
एकलव्य वापस लौट आया।
लेकिन उसने यह तय नहीं किया कि अब कुछ नहीं हो सकता।
उसने जंगल में द्रोणाचार्य की एक मिट्टी की प्रतिमा बनाई।
फिर उसी प्रतिमा को अपना गुरु मानकर अभ्यास शुरू कर दिया।
हर दिन।
घंटों।
बार-बार।
गलत हुआ तो फिर से।
बाण निशाने से चूका तो फिर से।
धीरे-धीरे उसका अभ्यास उसकी पहचान बन गया।
एक दिन द्रोणाचार्य और उनके शिष्य जंगल में थे।
एक कुत्ता लगातार भौंक रहा था।
कुछ ही देर में उसके मुंह के आसपास कई बाण इस तरह लगे थे कि वह घायल हुए बिना शांत हो गया।
द्रोणाचार्य ने पूछा —
"यह किसने किया?
"
एकलव्य सामने आया।
उसने बताया कि उसने उन्हें अपना गुरु मानकर अभ्यास किया है।
कहानी का अगला हिस्सा कठिन है।
द्रोणाचार्य ने गुरु-दक्षिणा में उसका अंगूठा मांग लिया।
एकलव्य ने अपना अंगूठा दे दिया।
यह प्रसंग आज भी कई तरह के सवाल खड़े करता है।
क्या यह न्याय था?
क्या एक प्रतिभाशाली व्यक्ति को उसकी पृष्ठभूमि के कारण रोका जाना उचित था?
क्या गुरु के प्रति समर्पण इतना बड़ा होना चाहिए कि व्यक्ति अपनी क्षमता ही खो दे?
इस कहानी को सिर्फ "त्याग महान है" कहकर खत्म कर देना शायद पर्याप्त नहीं।
क्योंकि इसमें दर्द भी है।
अन्याय भी है।
और एक ऐसे व्यक्ति की मेहनत भी है जिसने रास्ता न मिलने पर अपना रास्ता खुद बनाया।
महाभारत · Linked wisdom: Mahabharata, Adi Parva; needs citation-level verification | Evidence: traditional | Topics: अन्याय, समाज और धर्म, समर्पण
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “जब मैं शीशे में खुद को देखता हूँ, तो जो दिखता है वो शरीर है।
तो फिर मैं जिसे "मैं " कहता हूँ, वो कौन है?
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — मोह ही सब रोगों की जड़ है, उसी से अनेक पीड़ाएँ जन्म लेती हैं।
पकड़ ढीली होते ही दुःख हल्का होने लगता है।
इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है — दुनिया हमेशा हमें बराबर अवसर नहीं देती।
लेकिन किसी अवसर की कमी को अपनी क्षमता की कमी समझ लेना सबसे बड़ी गलती हो सकती है।
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।
इस अनुभव से एक बात सामने आती है
दुनिया हमेशा हमें बराबर अवसर नहीं देती। लेकिन किसी अवसर की कमी को अपनी क्षमता की कमी समझ लेना सबसे बड़ी गलती हो सकती है।
ऐसे ही कुछ और अनुभव
क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
