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मेरी जिंदगी में इतनी तकलीफें देखकर कभी-कभी सोचता हूँ कि सच में कोई ईश्वर है भी या नहीं।

श्लोक

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।5।।

uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet ātmaiva hyātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ

श्रीमद्भगवद्गीता · 6.5

चौपाई / दोहा

जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥

jehi ken jehi para satya sanehu, so tehi milai na kachhu sandehu

अर्थ

जिसका जिस पर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है — इसमें संदेह नहीं। सच्चा प्रेम कभी व्यर्थ नहीं जाता।

श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड

कथा

नीलकंठ: जब दर्द को अकेले सहना जरूरी नहीं

समुद्र मंथन चल रहा था।

देवता और असुर अमृत पाने के लिए समुद्र को मथ रहे थे।

सबकी नजर अमृत पर थी।

लेकिन अमृत से पहले कुछ ऐसा निकला जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी हलाहल विष।

वह विष इतना भयंकर था कि पूरी सृष्टि के लिए खतरा पैदा हो गया।

देवता परेशान हो गए।

असुर भी पीछे हट गए।

जिसे देखकर सब अमृत की उम्मीद कर रहे थे, वही अब विनाश का कारण बनता दिखाई दे रहा था।

कोई रास्ता समझ नहीं रहा था।

आखिर सब भगवान शिव के पास पहुंचे।

शिव ने उस विष को अपने ऊपर लेने का निर्णय किया।

उन्होंने हलाहल को पी लिया, लेकिन उसे निगला नहीं।

उन्होंने उसे अपने कंठ में रोक लिया।

विष की तीव्रता से उनका कंठ नीला पड़ गया और तभी से उन्हें नीलकंठ कहा गया।

इस कथा में एक बात मुझे बहुत मानवीय लगती है।

शिव ने सिर्फ विष नहीं लिया।

उन्होंने एक ऐसी समस्या अपने ऊपर ली जिसे बाकी सभी लोग संभाल नहीं पा रहे थे।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि दर्द उनके लिए आसान था।

विष का असर था।

पीड़ा थी।

और तभी पार्वती उनके पास आईं।

उन्होंने शिव के कंठ को थाम लिया ताकि विष नीचे जाए।

यहीं कहानी बदल जाती है।

क्योंकि त्याग का मतलब यह नहीं कि इंसान को हर दर्द अकेले सहना चाहिए।

हमारी जिंदगी में भी कभी-कभी ऐसा होता है।

घर की जिम्मेदारी है।

किसी अपने की बीमारी है।

पैसों की परेशानी है।

बच्चों की चिंता है।

नौकरी का तनाव है।

हम सबको संभालने की कोशिश करते रहते हैं और किसी से कुछ कहते नहीं।

बाहर से लोग कहते हैं "आप तो बहुत मजबूत हैं।

"

और अंदर से इंसान सोचता है कब तक?

नीलकंठ की कथा हमें सिर्फ दूसरों के लिए सहने की बात नहीं बताती।

यह यह भी याद दिलाती है कि सबसे मजबूत व्यक्ति को भी साथ की जरूरत होती है।

पार्वती का हाथ उस कहानी में छोटा-सा हिस्सा लग सकता है, लेकिन उसका अर्थ बहुत बड़ा है।

किसी के पास बैठ जाना।

उसका दर्द समझना।

उसका बोझ थोड़ा थाम लेना।

कभी-कभी यही सबसे बड़ी मदद होती है।

Linked wisdom: Samudra Manthan / Neelkanth episode — Puranic tradition; citation-level verification pending | Evidence: traditional | Topics: दर्द, त्याग, प्रियजन की बीमारी

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “मेरी जिंदगी में इतनी तकलीफें देखकर कभी-कभी सोचता हूँ कि सच में कोई ईश्वर है भी या नहीं।

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है जिसका जिस पर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है इसमें संदेह नहीं।

सच्चा प्रेम कभी व्यर्थ नहीं जाता।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है दूसरों के लिए जिम्मेदारी निभाना अच्छी बात है, लेकिन अपने दर्द को हमेशा छिपाकर रखना जरूरी नहीं।

मजबूत होने का मतलब यह नहीं कि किसी की जरूरत ही पड़े।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

दूसरों के लिए जिम्मेदारी निभाना अच्छी बात है, लेकिन अपने दर्द को हमेशा छिपाकर रखना जरूरी नहीं। मजबूत होने का मतलब यह नहीं कि किसी की जरूरत ही न पड़े।

कलश — शुभता का प्रतीक

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक