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प्रकृति में हर चीज़ अपने समय पर होती है --- न जल्दी, न देर। मैं अपनी जिंदगी में इतनी जल्दबाज़ी और बेचैनी क्यों महसूस करता हूँ?
श्लोक
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।।27।।
jātasya hi dhruvo mṛtyur dhruvaṁ janma mṛtasya cha tasmād aparihārye 'rthe na tvaṁ śhochitum arhasi
श्रीमद्भगवद्गीता · 2.27
चौपाई / दोहा
परहित सरिस धरम नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥
parahita sarisa dharama nahin bhai, para pira sama nahin adhamai
अर्थ
दूसरों के हित जैसा कोई धर्म नहीं, और दूसरों को पीड़ा देने जैसा कोई नीच कर्म नहीं। मन जब भारी हो, किसी और का भार हल्का कीजिए।
श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड
कथा
कर्म पर अधिकार, फल पर नहीं
युद्ध शुरू होने से पहले ही अर्जुन का मन इतना उलझ चुका था कि कृष्ण को उन्हें धीरे-धीरे समझाना पड़ा।
पहले बात आत्मा की हुई, फिर जीवन और मृत्यु की, और फिर बात आई कर्म की।
अर्जुन के मन में एक सवाल था—अगर नतीजा मेरे हाथ में ही नहीं है, तो फिर इतनी मेहनत करने का मतलब क्या है?
शायद यह सवाल सिर्फ अर्जुन का नहीं है।
हम भी कितनी बार पूरी मेहनत करते हैं, लेकिन मनचाहा परिणाम नहीं मिलता।
नौकरी के लिए कोशिश करते हैं, प्रमोशन का इंतजार करते हैं, कोई परीक्षा देते हैं, व्यापार में पैसा लगाते हैं—और जब परिणाम हमारे मुताबिक नहीं आता तो लगता है कि हमारी सारी मेहनत बेकार चली गई।
कृष्ण ने अर्जुन से कहा—
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
”
तुम्हारा अधिकार कर्म करने में है, उसके फल पर नहीं।
बात सुनने में बहुत सीधी है, लेकिन इसके भीतर बहुत कुछ छिपा है।
इसका मतलब यह नहीं कि परिणाम की कोई परवाह ही मत करो।
मतलब इतना है कि जो चीज तुम्हारे हाथ में नहीं है, उसे अपने मन का मालिक मत बना दो।
अर्जुन के सामने भी यही था।
युद्ध का परिणाम उनके हाथ में नहीं था।
कौन जीतेगा, कौन हारेगा, कौन जीवित रहेगा—इनमें से सब कुछ वे तय नहीं कर सकते थे।
लेकिन अपना कर्तव्य निभाना उनके हाथ में था।
कृष्ण ने उन्हें यही फर्क समझाया—तुम्हारे हिस्से में कर्म है, हर परिणाम की जिम्मेदारी नहीं।
हमारे जीवन में भी शायद यही सबसे मुश्किल बात है।
हम मेहनत से ज्यादा परिणाम को पकड़कर बैठ जाते हैं।
फिर हर दिन देखते हैं—क्या हुआ?
कितना मिला?
दूसरे मुझसे आगे क्यों निकल गए?
मेरी मेहनत का फायदा कब मिलेगा?
और धीरे-धीरे काम का आनंद खत्म होकर सिर्फ परिणाम की चिंता बच जाती है।
कृष्ण की बात हमें वापस वहीं ले आती है जहाँ हमारा नियंत्रण है।
आज का काम।
आज की ईमानदार कोशिश।
आज का अपना कर्तव्य।
बाकी सब हमारे हाथ में नहीं है।
मुझे इससे क्या सीखना है?
अगर नतीजा मेरे हाथ में नहीं है, तो हर असफल परिणाम के लिए खुद को दोषी ठहराना जरूरी नहीं।
मुझे यह देखना है कि मैंने अपना हिस्सा कितनी ईमानदारी से निभाया।
मेहनत बेकार नहीं जाती, भले ही वह हमेशा हमें उसी जगह न पहुँचाए जहाँ हम पहुँचना चाहते थे।
अब मुझे क्या करना है?
आज जो काम मेरे सामने है, उसे पूरे मन से करना है।
हर थोड़ी देर में परिणाम देखने के बजाय अपने काम पर वापस लौटना है।
और खुद से कहना है—
“फल मेरे हाथ में नहीं है।
लेकिन आज का कर्म मेरे हाथ में है।
”
श्रीमद्भगवद्गीता
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “प्रकृति में हर चीज़ अपने समय पर होती है --- न जल्दी, न देर।
मैं अपनी जिंदगी में इतनी जल्दबाज़ी और बेचैनी क्यों महसूस करता हूँ?
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — दूसरों के हित जैसा कोई धर्म नहीं, और दूसरों को पीड़ा देने जैसा कोई नीच कर्म नहीं।
मन जब भारी हो, किसी और का भार हल्का कीजिए।
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।
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क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
