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चंद्रमा घटता-बढ़ता रहता है, फिर भी वही चंद्रमा रहता है। क्या मेरे मन के उतार-चढ़ाव को भी इसी तरह समझा जा सकता है?

श्लोक

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।5।।

uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet ātmaiva hyātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ

श्रीमद्भगवद्गीता · 6.5

चौपाई / दोहा

सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत। मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥

So ananya jaken asi mati na tarai Hanumant

अर्थ

जिसकी यह बुद्धि नहीं डिगती कि मैं सेवक हूँ और सब में प्रभु ही हैं, वही अनन्य भक्त है — स्थिरता ही भक्ति है।

श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड

कथा

इंद्र और वृत्रासुर: जब पुराना तरीका काम न करे

कभी-कभी समस्या इसलिए बड़ी नहीं होती कि हम कमजोर हैं।

समस्या इसलिए बड़ी होती है क्योंकि जिस तरीके से हम उसे हल करने की कोशिश कर रहे हैं, वह तरीका ही काम नहीं कर रहा।

वृत्रासुर की कथा इसी बात को एक अलग रूप में सामने रखती है।

कथा के अनुसार, वृत्रासुर अत्यंत शक्तिशाली असुर था और उसे ऐसा वरदान प्राप्त था जिसके कारण सामान्य अस्त्रों से उसका वध करना लगभग असंभव था।

इंद्र ने उससे युद्ध किया, लेकिन सामान्य तरीके काम नहीं आए।

एक के बाद एक प्रयास असफल होते गए।

ऐसी स्थिति में अक्सर इंसान क्या करता है?

या तो कोशिश छोड़ देता है, या वही तरीका बार-बार दोहराता रहता है।

देवताओं के सामने भी यही समस्या थी।

तब दधीचि ऋषि की कथा सामने आती है।

उन्होंने अपने शरीर का त्याग करके अपनी अस्थियां दान करने का निर्णय लिया।

उन्हीं से बना वज्र आगे चलकर वृत्रासुर के विरुद्ध प्रयोग किया गया।

कथा में आगे इंद्र ने ऐसा समय चुना जो पूरी तरह दिन था, रात—संध्या।

जिस परिस्थिति को पहले असंभव समझा जा रहा था, उसे एक नए तरीके से देखा गया।

यहां मुझे सबसे महत्वपूर्ण बात युद्ध की नहीं, सोच बदलने की लगती है।

कभी हम नौकरी के लिए लगातार आवेदन करते हैं और जवाब नहीं मिलता।

फिर वही रिज्यूमे भेजते रहते हैं।

कभी व्यापार में नुकसान होता है और हम उसी तरीके से उसे ठीक करने की कोशिश करते रहते हैं।

कभी रिश्ते में समस्या होती है और हम वही बात बार-बार कहते रहते हैं।

फिर हम खुद से कहते हैं—"मेरी किस्मत ही खराब है।

"

शायद हमेशा किस्मत समस्या नहीं होती।

कभी तरीका बदलने की जरूरत होती है।

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स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “चंद्रमा घटता-बढ़ता रहता है, फिर भी वही चंद्रमा रहता है।

क्या मेरे मन के उतार-चढ़ाव को भी इसी तरह समझा जा सकता है?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है जिसकी यह बुद्धि नहीं डिगती कि मैं सेवक हूँ और सब में प्रभु ही हैं, वही अनन्य भक्त है स्थिरता ही भक्ति है।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है जब लगातार प्रयास करने के बाद भी रास्ता नहीं बन रहा हो, तो सिर्फ ज्यादा मेहनत करना ही समाधान नहीं है।

कभी-कभी रुककर यह देखना ज्यादा जरूरी है कि क्या मैं सही दिशा में मेहनत कर रहा हूं?

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

जब लगातार प्रयास करने के बाद भी रास्ता नहीं बन रहा हो, तो सिर्फ ज्यादा मेहनत करना ही समाधान नहीं है। कभी-कभी रुककर यह देखना ज्यादा जरूरी है कि क्या मैं सही दिशा में मेहनत कर रहा हूं?

कलश — शुभता का प्रतीक

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक