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यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है

रात के आसमान में तारे देखकर लगता है जैसे वो लाखों साल पुरानी रोशनी अभी मुझ तक पहुंच रही है। इस विचार से समय और अस्तित्व को लेकर मन में क्या उठता है?

श्लोक

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च।।20।।

aham ātmā guḍākeśha sarva-bhūtāśhaya-sthitaḥ aham ādiśh cha madhyaṁ cha bhūtānām anta eva cha

श्रीमद्भगवद्गीता · 10.20

चौपाई / दोहा

सब कर मत खगनायक एहा। करिअ राम पद पंकज नेहा॥

saba kara mata khaganayaka eha, karia Rama pada pankaja neha

अर्थ

सबका मत यही है — राम के चरणों में प्रेम कीजिए। जब कुछ समझ न आए, तब श्रद्धा ही सबसे सरल रास्ता है।

श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड

कथा

राम और परशुराम: जब ताकत को खुद को साबित करने की जरूरत न हो

सीता स्वयंवर के बाद का समय था।

शिव धनुष टूट चुका था और सभा में अभी उस घटना की चर्चा चल ही रही थी।

तभी परशुराम वहां पहुंचे।

वे क्रोध में थे।

उनके सामने शिव का धनुष टूट चुका था और वे जानना चाहते थे कि ऐसा करने का साहस किसने किया।

सभा में तनाव फैल गया।

राम आगे आए और बहुत शांत स्वर में स्वीकार किया कि धनुष उन्होंने ही उठाया था।

परशुराम का क्रोध और बढ़ गया।

उन्होंने राम को चुनौती दी।

उनके सामने विष्णु का धनुष रखा और कहा कि अगर राम वास्तव में इतने सामर्थ्यवान हैं, तो उसे उठाकर दिखाएं।

यह वह क्षण था जहां कोई भी युवा योद्धा अपने अहंकार में सकता था।

राम के पास अपनी शक्ति दिखाने का पूरा अवसर था।

लेकिन राम ने परशुराम का अपमान नहीं किया।

उन्होंने बहस नहीं की।

उन्होंने अपनी महानता बताने की कोशिश नहीं की।

वे शांत रहे और धनुष उठा लिया।

जब परशुराम ने राम की वास्तविकता को पहचाना, तो उनका क्रोध धीरे-धीरे शांत हो गया।

मुझे इस प्रसंग में राम की शक्ति से ज्यादा उनकी शांति महत्वपूर्ण लगती है।

हमारे जीवन में भी ऐसे लोग आते हैं जो हमें बार-बार साबित करने के लिए मजबूर करते हैं कि हम क्या कर सकते हैं।

ऑफिस में कोई हमारी क्षमता पर सवाल करता है।

परिवार में कोई हमें कम समझता है।

किसी प्रतियोगिता में कोई हमें चुनौती देता है।

और हमारा मन तुरंत कहता है "अच्छा, अब मैं दिखाता हूं कि मैं क्या कर सकता हूं।

"

लेकिन हर चुनौती का जवाब गुस्से से देना जरूरी नहीं।

कभी-कभी सबसे मजबूत जवाब यह होता है कि आप अपना काम करें और परिणाम को बोलने दें।

Linked wisdom: Valmiki Ramayana / Ramcharitmanas, Bala Kanda — citation-level verification required | Evidence: traditional | Topics: अहंकार, आत्मसंशय

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “रात के आसमान में तारे देखकर लगता है जैसे वो लाखों साल पुरानी रोशनी अभी मुझ तक पहुंच रही है।

इस विचार से समय और अस्तित्व को लेकर मन में क्या उठता है?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है सबका मत यही है राम के चरणों में प्रेम कीजिए।

जब कुछ समझ आए, तब श्रद्धा ही सबसे सरल रास्ता है।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है जिसे अपनी शक्ति पर भरोसा होता है, उसे हर समय अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने की जरूरत नहीं पड़ती।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

जिसे अपनी शक्ति पर भरोसा होता है, उसे हर समय अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने की जरूरत नहीं पड़ती।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक