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यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है

नदी कभी पीछे मुड़कर नहीं देखती, लगातार आगे बहती रहती है। मैं अपने अतीत को पकड़े रहने की जगह आगे बढ़ना कैसे सीखूं?

श्लोक

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।66।।

sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śharaṇaṁ vraja ahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo mokṣhayiṣhyāmi mā śhuchaḥ

श्रीमद्भगवद्गीता · 18.66

चौपाई / दोहा

जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥

jehi ken jehi para satya sanehu, so tehi milai na kachhu sandehu

अर्थ

जिसका जिस पर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है — इसमें संदेह नहीं। सच्चा प्रेम कभी व्यर्थ नहीं जाता।

श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड

कथा

गणेश की परिक्रमा: जब सबसे तेज़ होना जरूरी नहीं

एक दिन शिव और पार्वती के सामने सवाल उठा गणेश और कार्तिकेय में से प्रथम पूज्य कौन होगा?

एक प्रतियोगिता रखी गई।

जो पूरे संसार की परिक्रमा करके सबसे पहले लौटेगा, वही विजेता होगा।

कार्तिकेय अपने मयूर पर बैठकर तुरंत निकल पड़े।

गणेश के सामने समस्या थी।

उनका वाहन मूषक था।

वे कार्तिकेय जितनी तेजी से कैसे दौड़ सकते थे?

यहीं गणेश ने दौड़ लगाने के बजाय सोचना शुरू किया।

उन्होंने अपने माता-पिता शिव और पार्वती के चारों ओर परिक्रमा की।

फिर कहा

"मेरे लिए मेरे माता-पिता ही पूरा संसार हैं।

"

कहानी के अनुसार, यही बुद्धि प्रतियोगिता का उत्तर बन गई।

कार्तिकेय वापस लौटे तो उन्हें पता चला कि गणेश को प्रथम पूज्य घोषित कर दिया गया है।

पहली नजर में यह सिर्फ बच्चों की एक कहानी जैसी लग सकती है।

लेकिन इसे अपनी जिंदगी में देखें।

हममें से बहुत लोग लगातार दौड़ रहे हैं।

किसी का प्रमोशन हो गया।

किसी ने घर खरीद लिया।

किसी ने नई कार ले ली।

किसी का बच्चा आगे निकल गया।

किसी का कारोबार बड़ा हो गया।

और हम सोचते रहते हैं

"मैं पीछे क्यों हूं?

"

लेकिन हर दौड़ में तेज़ दौड़ना ही समाधान नहीं होता।

कभी-कभी हमें रुककर यह देखना पड़ता है कि हम दौड़ किस दिशा में रहे हैं।

Linked wisdom: Puranic tradition — needs citation-level verification | Evidence: traditional | Topics: जीवन के प्रश्न, बुद्धि, तरक्की नहीं हो रही

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “नदी कभी पीछे मुड़कर नहीं देखती, लगातार आगे बहती रहती है।

मैं अपने अतीत को पकड़े रहने की जगह आगे बढ़ना कैसे सीखूं?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है जिसका जिस पर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है इसमें संदेह नहीं।

सच्चा प्रेम कभी व्यर्थ नहीं जाता।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है दूसरों से तेज़ होना हमेशा सफलता नहीं है।

कभी-कभी असली बुद्धिमानी यह समझने में है कि मेरे लिए वास्तव में महत्वपूर्ण क्या है।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

दूसरों से तेज़ होना हमेशा सफलता नहीं है। कभी-कभी असली बुद्धिमानी यह समझने में है कि मेरे लिए वास्तव में महत्वपूर्ण क्या है।

कलश — शुभता का प्रतीक

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक