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यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है

जिस रिश्ते में मैंने अपना सब कुछ लगा दिया, वो अब खत्म हो गया है। यह दर्द इतना गहरा है कि रोज़मर्रा के काम करना भी मुश्किल लगता है।

श्लोक

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।7।।

yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata abhyutthānam adharmasya tadātmānaṁ sṛjāmyaham

श्रीमद्भगवद्गीता · 4.7

चौपाई / दोहा

कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥

kadara mana kahun eka adhara, daiva daiva alasi pukara

अर्थ

कायर और आलसी मन का एक ही सहारा होता है — भाग्य को दोष देना। साहस कर्म से आता है, प्रतीक्षा से नहीं।

श्रीरामचरितमानस · बालकाण्ड

कथा

सब कुछ छोड़कर, बस यह एक बात

गीता के अंत तक आते-आते अर्जुन बहुत कुछ सुन चुके थे।

आत्मा।

कर्म।

ज्ञान।

ध्यान।

भक्ति।

धर्म।

कर्तव्य।

लेकिन फिर भी बातचीत एक बहुत गहरी बात पर जाकर ठहरती है।

कृष्ण कहते हैं—

“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥”

सब कुछ छोड़कर मेरी शरण में आओ।

मैं तुम्हें मुक्त कर दूँगा।

शोक मत करो।

यह गीता का अंतिम बड़ा संदेश है।

इसे सिर्फ “सब छोड़ दो” समझ लेना शायद इस बात को बहुत छोटा कर देना होगा।

अर्जुन ने पूरी बातचीत में अपने सवाल पूछे।

कृष्ण ने उन्हें कर्म समझाया।

कर्तव्य समझाया।

ज्ञान समझाया।

और अंत में समर्पण की बात कही।

हमारी जिंदगी में भी कई बार ऐसा होता है।

हम हर चीज को खुद संभालना चाहते हैं।

हर सवाल का जवाब खुद ढूँढना चाहते हैं।

हर समस्या खुद ठीक करना चाहते हैं।

हर परिणाम अपने नियंत्रण में रखना चाहते हैं।

और फिर थक जाते हैं।

कभी-कभी सबसे बड़ी राहत समस्या खत्म होने से पहले ही मिल जाती है—जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि हर चीज हमारे नियंत्रण में नहीं है।

समर्पण का मतलब कोशिश छोड़ देना नहीं है।

यह जिम्मेदारी से भागना भी नहीं है।

यह उस चीज का बोझ छोड़ना है जिसे हम अपने हाथ में रख ही नहीं सकते।

अर्जुन को भी अंत में निर्णय स्वयं लेना था।

कृष्ण ने उनके लिए निर्णय नहीं लिया।

उन्होंने रास्ता दिखाया।

मुझे इससे क्या सीखना है?

हर बोझ अकेले उठाना जरूरी नहीं है।

कुछ चीजें मेरी जिम्मेदारी हैं।

कुछ चीजें मेरे नियंत्रण में नहीं हैं।

इन दोनों के बीच का फर्क समझना भी एक तरह की मुक्ति है।

अब मुझे क्या करना है?

आज उस एक चिंता को पहचानना है जिसे मैं लगातार अपने नियंत्रण में रखने की कोशिश कर रहा हूँ।

फिर खुद से पूछना है—

“इसमें वास्तव में मेरे हाथ में क्या है?

जो मेरे हाथ में है, उसके लिए कर्म करना है।

और जो मेरे हाथ में नहीं है, उसके लिए थोड़ा-सा भरोसा सीखना है।

श्रीमद्भगवद्गीता

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “जिस रिश्ते में मैंने अपना सब कुछ लगा दिया, वो अब खत्म हो गया है।

यह दर्द इतना गहरा है कि रोज़मर्रा के काम करना भी मुश्किल लगता है।

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है कायर और आलसी मन का एक ही सहारा होता है भाग्य को दोष देना।

साहस कर्म से आता है, प्रतीक्षा से नहीं।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक