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यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है

जिस दोस्त पर मैं आंख बंद करके भरोसा करता था, उसी ने मेरे पीठ पीछे मेरे बारे में गलत बातें कहीं। यह जानकर बहुत तकलीफ हुई।

श्लोक

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च।।20।।

aham ātmā guḍākeśha sarva-bhūtāśhaya-sthitaḥ aham ādiśh cha madhyaṁ cha bhūtānām anta eva cha

श्रीमद्भगवद्गीता · 10.20

चौपाई / दोहा

सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा॥

Sunu muni tohi kahaun saharosa, bhajahin je mohi taji sakal bharosa

अर्थ

जो सब आसरे छोड़कर मुझ पर भरोसा करते हैं, उनका भार मैं स्वयं वहन करता हूँ।

श्रीरामचरितमानस · अरण्यकाण्ड

कथा

कर्ण: जिसे दुनिया ने बार-बार पूछा, "तुम हो कौन?"

कर्ण की जिंदगी की सबसे बड़ी तकलीफ सिर्फ गरीबी या युद्ध नहीं थी।

उनकी तकलीफ यह थी कि उन्हें बार-बार अपनी पहचान साबित करनी पड़ी।

जन्म के बाद परिस्थितियों के कारण वे अपने वास्तविक परिवार से दूर हो गए और एक सारथी परिवार में पले-बढ़े।

जिसने उन्हें पाला, उसने उन्हें अपना बेटा माना।

लेकिन दुनिया ने उन्हें बार-बार याद दिलाया कि वे "किसके बेटे" हैं।

कर्ण को धनुर्विद्या से प्रेम था।

वे सीखना चाहते थे।

वे आगे बढ़ना चाहते थे।

लेकिन जब भी वे किसी बड़े अवसर के सामने खड़े होते, उनकी प्रतिभा से पहले उनकी पहचान पूछी जाती।

एक प्रसिद्ध प्रसंग में, जब अर्जुन ने अपनी धनुर्विद्या का प्रदर्शन किया, तब कर्ण भी आगे आए।

वे भी वही करके दिखाना चाहते थे जो अर्जुन ने किया था।

लेकिन सवाल उनकी कला का नहीं हुआ।

सवाल हुआ

"तुम्हारा वंश क्या है?

"

यही बात शायद किसी इंसान को भीतर से तोड़ देती है।

जब वह अपनी पूरी मेहनत लेकर सामने आए और सामने वाला उसकी मेहनत देखने के बजाय उसकी पहचान पूछे।

तभी दुर्योधन आगे आया।

उसने कर्ण को अंग देश का राजा बना दिया।

उस क्षण कर्ण को पहली बार ऐसा लगा कि किसी ने उसे उसकी क्षमता के कारण स्वीकार किया है।

जिस दुनिया ने उससे पूछा था, "तुम कौन हो?

"

दुर्योधन ने जैसे कहा

"तुम मेरे लिए योग्य हो।

"

और यही अपनापन कर्ण के जीवन का सबसे बड़ा रिश्ता बन गया।

साल बीतते गए।

फिर युद्ध से पहले कृष्ण कर्ण के पास गए और उन्हें उनके जन्म का सच बताया कि वे कुंती के पुत्र हैं और पांडवों के बड़े भाई हैं।

कर्ण के सामने अचानक वह सब था जिसकी उन्होंने जीवन भर कमी महसूस की थी।

परिवार।

पहचान।

सम्मान।

राज्य।

पांडवों के साथ खड़े होने का अवसर।

लेकिन कर्ण ने दुर्योधन का साथ छोड़ने से इनकार कर दिया।

उनका तर्क सीधा था

जिस समय पूरी दुनिया ने मुझे ठुकराया, उस समय दुर्योधन मेरे साथ खड़ा था।

अब जब मुझे सब कुछ मिल सकता है, तब मैं उसी व्यक्ति को छोड़ दूं?

यहीं कर्ण की कहानी बहुत मानवीय हो जाती है।

क्योंकि यह सिर्फ सही और गलत की कहानी नहीं है।

यह उस इंसान की कहानी है जिसने जीवन में पहली बार अपनापन पाया और फिर उसी अपनापन का ऋणी हो गया।

कभी-कभी हम भी किसी रिश्ते, दोस्ती या जगह से इसलिए चिपके रहते हैं क्योंकि उसने हमें उस समय स्वीकार किया था जब बाकी दुनिया ने नहीं किया।

लेकिन सवाल यह है

क्या किसी का हमें स्वीकार करना हमेशा यह साबित करता है कि उसका रास्ता भी सही है?

कर्ण का जीवन इसका आसान जवाब नहीं देता।

महाभारत · Linked wisdom: Mahabharata — Adi Parva / Udyoga Parva episodes; needs citation-level verification | Evidence: traditional | Topics: पहचान खो गई, अन्याय, विश्वासघात

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “जिस दोस्त पर मैं आंख बंद करके भरोसा करता था, उसी ने मेरे पीठ पीछे मेरे बारे में गलत बातें कहीं।

यह जानकर बहुत तकलीफ हुई।

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है जो सब आसरे छोड़कर मुझ पर भरोसा करते हैं, उनका भार मैं स्वयं वहन करता हूँ।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है किसी का मुझे स्वीकार करना बहुत बड़ी बात है।

लेकिन अपनी पहचान सिर्फ किसी दूसरे व्यक्ति की स्वीकृति पर नहीं छोड़नी चाहिए।

कभी-कभी जिसे हम अपना सबसे बड़ा सहारा समझते हैं, उसी रिश्ते के कारण हम गलत दिशा में भी टिके रह सकते हैं।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

किसी का मुझे स्वीकार करना बहुत बड़ी बात है। लेकिन अपनी पहचान सिर्फ किसी दूसरे व्यक्ति की स्वीकृति पर नहीं छोड़नी चाहिए। कभी-कभी जिसे हम अपना सबसे बड़ा सहारा समझते हैं, उसी रिश्ते के कारण हम गलत दिशा में भी टिके रह सकते हैं।

कलश — शुभता का प्रतीक

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक