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कुबेर-लक्ष्मी पूजा

कुबेर से संबंधित · विशेष कामना

अन्य नाम: धन प्राप्ति पूजा, कुबेर उपासना

यह पूजा क्या है?

धनाध्यक्ष कुबेर और माता लक्ष्मी की संयुक्त उपासना, जो प्रायः शुक्रवार या धनतेरस को की जाती है।

किसकी पूजा है?

कुबेरलक्ष्मी

इसे क्यों करते हैं?

लक्ष्मी धन देती हैं और कुबेर उसे स्थिर रखते हैं। जब धन आकर टिकता नहीं, तब यह उपासना संयम, व्यय-विवेक और स्थिरता के भाव के साथ की जाती है।

इसे करने से क्या फल मिलता है?

आर्थिक अनुशासन का भाव जागता है; अनावश्यक व्यय घटता है; व्यापार में स्थिरता की मान्यता; धन के प्रति भय के स्थान पर संतोष।

कब की जाती है?

शुक्रवार, धनतेरस, या अक्षय तृतीया। संध्या समय श्रेष्ठ।

कौन कर सकता है?

गृहस्थ, व्यापारी, नौकरीपेशा — कोई भी।

क्या कोई विशेष नियम हैं?

पूजा स्थल और तिजोरी दोनों स्वच्छ हों। पूजा के बाद कुछ अंश दान करने का नियम अनिवार्य माना गया है।

कब नहीं करनी चाहिए?

कोई विशेष निषेध नहीं।

कैसे की जाती है? — संक्षिप्त क्रम

  1. 1. संध्या स्नान कर पूजा स्थल स्वच्छ करें
  2. 2. लक्ष्मी और कुबेर के समक्ष घी का दीपक जलाएँ
  3. 3. कमल पुष्प, अक्षत, कौड़ी और श्रीफल अर्पित करें
  4. 4. "ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः" तथा "ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये नमः" का 108-108 बार जप करें
  5. 5. श्री सूक्त का पाठ करें
  6. 6. आय का एक छोटा अंश दान करें

विस्तृत विधि

धन उपासना की परंपरागत शर्त यह है कि साधक अपने व्यय का लेखा रखे। कहा गया है कि जिस घर में आय-व्यय का हिसाब नहीं, वहाँ लक्ष्मी नहीं ठहरतीं। इसलिए इस पूजा के साथ एक बही या नोटबुक रखकर उसका पूजन किया जाता है और उसी में मासिक हिसाब लिखा जाता है। दान के बिना यह उपासना अधूरी मानी गई है।

पूजा सामग्री — पूरी सूची

नीचे दी गई सूची में सामान्य पूजन सामग्री और इस पूजा से जुड़ी विशेष सामग्री — दोनों सम्मिलित हैं। जो वस्तु उपलब्ध न हो, उसके स्थान पर जल, अक्षत और पुष्प अर्पित कर देना भी परंपरा में स्वीकार्य है।

  • 1.कमल या लाल पुष्प
  • 2.अक्षत
  • 3.कौड़ी
  • 4.श्रीफल
  • 5.बही या नोटबुक
  • 6.घी का दीपक
  • 7.मिठाई

सामग्री क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।

कितने समय की40 मिनट
घर या मंदिरघर या दुकान
पुरोहित आवश्यक?आवश्यक नहीं

क्षेत्रीय अंतर

गुजरात और राजस्थान में चोपड़ा पूजन (बही पूजन) की परंपरा प्रमुख है।

पारंपरिक महत्व

कुबेर कोषाध्यक्ष हैं, स्वामी नहीं — धन का स्वामी बनने का भाव ही उसे अस्थिर करता है।

परंपरा और संदर्भ

परंपरा: सनातन

क्षेत्र: भारत

संदर्भ: श्री सूक्त · पद्म पुराण

विधि और सामग्री क्षेत्र, परिवार और परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है। यहाँ दी गई जानकारी सामान्य पारंपरिक ढाँचा है, कोई अनिवार्य नियम नहीं।

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आपके अनुभव और प्रश्न

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