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राहु से संबंधित · ग्रह शांति
अन्य नाम: छाया ग्रह शांति, कालसर्प शांति
यह पूजा क्या है?
राहु और केतु की शांति हेतु शनिवार या अमावस्या को किया जाने वाला जप, दीपदान और दान।
किसकी पूजा है?
इसे क्यों करते हैं?
राहु भ्रम और अतृप्त इच्छा का, केतु वैराग्य और अचानक हानि का प्रतीक है। इनके प्रभाव में मन सत्य और कल्पना में भेद नहीं कर पाता। यह पूजा मन की स्पष्टता लौटाने के लिए है।
इसे करने से क्या फल मिलता है?
मानसिक भ्रम और भय घटता है; नींद सुधरती है; धोखे और गुप्त शत्रुओं से रक्षा की मान्यता; निर्णय में स्पष्टता आती है।
कब की जाती है?
अमावस्या, शनिवार या ग्रहण काल के पश्चात। संध्या समय श्रेष्ठ।
कौन कर सकता है?
कोई भी व्यक्ति। मानसिक अशांति से पीड़ित व्यक्ति के लिए विशेष रूप से बताई गई है।
क्या कोई विशेष नियम हैं?
दीपक सरसों तेल का हो और दक्षिण-पश्चिम दिशा में रखा जाए। जप के समय आँखें बंद रखें। इस दिन नशा और झूठ पूर्णतः वर्जित।
कब नहीं करनी चाहिए?
मानसिक रोग की चिकित्सा चल रही हो तो उसे बंद न करें — यह पूजा उसका विकल्प नहीं, सहारा है।
कैसे की जाती है? — संक्षिप्त क्रम
- 1. संध्या समय स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें
- 2. सरसों तेल का दीपक जलाएँ
- 3. नारियल, काले-सफेद तिल और उड़द अर्पित करें
- 4. "ॐ रां राहवे नमः" 108 बार तथा "ॐ कें केतवे नमः" 108 बार जप करें
- 5. दुर्गा सप्तशती का अर्गला स्तोत्र या भैरव स्तुति करें
- 6. कंबल, नारियल या तिल का दान करें
विस्तृत विधि
छाया ग्रहों की शांति में बाहरी आडंबर नहीं, मन की शुद्धि प्रमुख है। परंपरा में कहा गया है कि राहु का प्रभाव तब घटता है जब व्यक्ति अपनी अतृप्त इच्छा को स्वीकार कर ले, और केतु का प्रभाव तब जब वह किसी एक वस्तु का त्याग कर दे। इसलिए इस पूजा के साथ चालीस दिन के लिए एक प्रिय वस्तु का त्याग करने का संकल्प लिया जाता है।
पूजा सामग्री — पूरी सूची
नीचे दी गई सूची में सामान्य पूजन सामग्री और इस पूजा से जुड़ी विशेष सामग्री — दोनों सम्मिलित हैं। जो वस्तु उपलब्ध न हो, उसके स्थान पर जल, अक्षत और पुष्प अर्पित कर देना भी परंपरा में स्वीकार्य है।
- 1.सरसों का तेल
- 2.नारियल
- 3.काले तिल
- 4.सफेद तिल
- 5.उड़द
- 6.कंबल
- 7.धूप
- 8.दीपक
सामग्री क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।
क्षेत्रीय अंतर
त्र्यंबकेश्वर और उज्जैन में विस्तृत कालसर्प विधि प्रचलित है; घर पर संक्षिप्त जप विधि पर्याप्त मानी जाती है।
पारंपरिक महत्व
राहु-केतु को छाया कहा गया है — छाया से लड़ा नहीं जाता, प्रकाश जलाया जाता है। इसीलिए इस उपासना का केंद्र दीप है।
परंपरा और संदर्भ
परंपरा: सनातन
क्षेत्र: भारत
संदर्भ: नारद पुराण · ज्योतिष परंपरा
विधि और सामग्री क्षेत्र, परिवार और परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है। यहाँ दी गई जानकारी सामान्य पारंपरिक ढाँचा है, कोई अनिवार्य नियम नहीं।
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आपके अनुभव और प्रश्न
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