पारंपरिक कलश← पूजा और संस्कार

संकष्टी चतुर्थी

भगवान गणेश से संबंधित · तिथि व्रत · व्रत

अन्य नाम: संकट चौथ, अंगारकी चतुर्थी

यह पूजा क्या है?

संकष्टी चतुर्थी हर मास कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को रखी जाती है। चंद्रदर्शन के बाद पारण की परंपरा है। इसका केंद्र भगवान गणेश हैं, और पूरी प्रक्रिया उन्हीं के आवाहन, पूजन और विदाई के क्रम में चलती है। परंपरा में इसे मुख्यतः संकट, संकल्प जैसे अवसरों से जोड़ा गया है। यह कोई कठिन या खर्चीला अनुष्ठान नहीं है — इसे सामान्य घर में, उपलब्ध सामग्री से और सीमित समय में भी उतनी ही श्रद्धा से किया जा सकता है। शास्त्रों और लोक-परंपरा दोनों में बार-बार यही कहा गया है कि सामग्री की भव्यता नहीं, भाव की शुद्धता ही मुख्य है।

किसकी पूजा है?

भगवान गणेश

इसे क्यों करते हैं?

परंपरा में इसे कठिन समय में धैर्य और संकल्प के भाव से रखा जाता है। इसके पीछे भाव यह है कि जीवन में जो कुछ मिला है उसके लिए कृतज्ञता प्रकट की जाए और जो आगे करना है उसके लिए मन को स्थिर किया जाए। भगवान गणेश के समक्ष बैठकर व्यक्ति अपनी चिंता, अपनी इच्छा और अपना संकल्प स्पष्ट शब्दों में रखता है — और यही स्पष्टता उसे भीतर से हल्का करती है। दूसरा कारण सामाजिक है: यह अनुष्ठान परिवार को एक स्थान पर बैठाता है, बच्चों तक परंपरा पहुँचाता है और पड़ोस-समाज से जुड़ाव बनाए रखता है। तीसरा कारण अनुशासन का है — नियत समय, नियत क्रम और नियत संयम व्यक्ति के दिन को एक ठहराव देते हैं।

इसे करने से क्या फल मिलता है?

संकष्टी चतुर्थी करने से क्या फल मिलता है — इसका उत्तर परंपरा दो स्तरों पर देती है। पहला स्तर भीतर का है: भगवान गणेश के समक्ष बैठकर, संकल्प लेकर और पूरी विधि धैर्य से करने पर मन का बिखराव कम होता है, क्रोध और जल्दबाज़ी घटती है, और निर्णय लेने में स्थिरता आती है। दूसरा स्तर बाहर का है: व्रत का फल परंपरा में केवल भूखा रहना नहीं, बल्कि संयम है — इच्छाओं पर नियंत्रण, वाणी में मृदुता और मन में धैर्य। कहा जाता है कि यही संयम धीरे-धीरे स्वभाव बदल देता है। इसके अतिरिक्त परिवार में परस्पर सहयोग बढ़ता है, घर का वातावरण सकारात्मक रहता है, बच्चों में संस्कार और बड़ों के प्रति आदर का भाव विकसित होता है, तथा दान और प्रसाद-वितरण से आसपास के लोगों तक भी उस शुभ का हिस्सा पहुँचता है। परंपरा यह भी स्पष्ट कहती है कि फल का अर्थ कोई तात्कालिक चमत्कार नहीं है। फल क्रमशः आता है — पहले भाव बदलता है, फिर व्यवहार, और तब परिस्थिति। इसीलिए कहा गया है कि पूजा का सबसे बड़ा फल स्वयं पूजा करने वाले का बदला हुआ मन है।

कब की जाती है?

हर मास कृष्ण चतुर्थी को; मंगलवार को पड़ने पर अंगारकी कहलाती है।

कौन कर सकता है?

कोई भी व्यक्ति।

क्या कोई विशेष नियम हैं?

चंद्रदर्शन के बाद ही पारण की परंपरा है।

कब नहीं करनी चाहिए?

अस्वस्थता में उपवास से बचें।

कैसे की जाती है? — संक्षिप्त क्रम

  1. 1. संकल्प
  2. 2. गणेश पूजन
  3. 3. दूर्वा अर्पण
  4. 4. व्रत कथा
  5. 5. चंद्रदर्शन
  6. 6. अर्घ्य
  7. 7. पारण

विस्तृत विधि

संकष्टी चतुर्थी की विधि को परंपरा में जल्दबाज़ी का काम नहीं माना गया। पूरी प्रक्रिया एक क्रम में चलती है, और हर चरण का अपना भाव है। सबसे पहले संकल्प लिया जाता है — हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर मन ही मन यह कहा जाता है कि यह पूजा किस उद्देश्य से, किसके निमित्त और किस भाव से की जा रही है; परंपरा में यही संकल्प पूरी पूजा की नींव माना गया है। इसके बाद श्री गणेश का पूजन होता है — रोली, अक्षत, दूर्वा और मोदक अर्पित कर किसी भी शुभ कार्य के निर्विघ्न पूर्ण होने की प्रार्थना की जाती है। फिर दूर्वा अर्पण किया जाता है। तत्पश्चात व्रत-कथा सुनी जाती है, अधिकतर पूरे परिवार के साथ बैठकर। आगे चंद्रदर्शन किया जाता है। इसके उपरांत अर्घ्य दिया जाता है — तांबे के पात्र से जल की धार, अक्षत और पुष्प के साथ। अंत में व्रत का पारण किया जाता है — निर्धारित समय पर पहले जल, फिर प्रसाद और तब सामान्य भोजन लिया जाता है। पूरी विधि में मंत्रों का शुद्ध उच्चारण उतना आवश्यक नहीं माना गया जितना भाव की सच्चाई — परंपरा कहती है कि जो मन से किया जाए, वही पूर्ण है। क्षेत्र, परिवार और कुल-परंपरा के अनुसार चरणों का क्रम थोड़ा अलग हो सकता है; ऐसे में घर के बड़ों या कुल-पुरोहित की बताई विधि ही मान्य होती है।

पूजा सामग्री — पूरी सूची

नीचे दी गई सूची में सामान्य पूजन सामग्री और इस पूजा से जुड़ी विशेष सामग्री — दोनों सम्मिलित हैं। जो वस्तु उपलब्ध न हो, उसके स्थान पर जल, अक्षत और पुष्प अर्पित कर देना भी परंपरा में स्वीकार्य है।

  • 1.स्वच्छ चौकी या आसन
  • 2.लाल या पीला वस्त्र
  • 3.शुद्ध जल और गंगाजल
  • 4.कलश (तांबा या मिट्टी)
  • 5.आम के पत्ते
  • 6.नारियल
  • 7.अक्षत (साबुत चावल)
  • 8.रोली और कुमकुम
  • 9.हल्दी
  • 10.चंदन
  • 11.पुष्प और पुष्पमाला
  • 12.दूर्वा
  • 13.धूप या अगरबत्ती
  • 14.घी का दीपक और रुई की बाती
  • 15.कपूर
  • 16.माचिस
  • 17.पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
  • 18.मौली या कलावा
  • 19.सुपारी और पान के पत्ते
  • 20.इलायची और लौंग
  • 21.मिष्ठान्न
  • 22.ऋतु-फल
  • 23.तुलसी दल
  • 24.आरती की थाली
  • 25.घंटी और शंख
  • 26.जल का लोटा और आचमनी
  • 27.दक्षिणा हेतु सिक्के
  • 28.प्रसाद हेतु पात्र
  • 29.कूड़ा एवं निर्माल्य रखने का पात्र
  • 30.दूर्वा (21 गांठ)
  • 31.मोदक या लड्डू
  • 32.सिंदूर
  • 33.लाल पुष्प
  • 34.फलाहार सामग्री
  • 35.व्रत कथा की पुस्तक
  • 36.पारण हेतु प्रसाद
  • 37.दीप
  • 38.अक्षत
  • 39.जल

सामग्री क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।

कितने समय कीदिन भर
घर या मंदिरघर पर
पुरोहित आवश्यक?आवश्यक नहीं

क्षेत्रीय अंतर

महाराष्ट्र में यह व्रत विशेष रूप से प्रचलित है।

पारंपरिक महत्व

संकल्प और धैर्य का अभ्यास।

परंपरा और संदर्भ

परंपरा: पुराणिक परंपरा · लोक परंपरा

क्षेत्र: पश्चिम भारत · महाराष्ट्र · उत्तर भारत

संदर्भ: पुराणिक एवं लोक परंपरा

विधि और सामग्री क्षेत्र, परिवार और परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है। यहाँ दी गई जानकारी सामान्य पारंपरिक ढाँचा है, कोई अनिवार्य नियम नहीं।

शायद आप यह भी देखना चाहें

आपके अनुभव और प्रश्न

इस पूजा से जुड़ा अपना अनुभव या जिज्ञासा यहाँ साझा करें। नाम देना आवश्यक नहीं है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

← पूजा और संस्कार