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यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है

कई चीजों की कीमत मुझे तब समझ आई जब वे मेरे पास नहीं रहीं---किसी अपने का साथ, घर का माहौल या जिंदगी की छोटी-छोटी सुविधाएं। अब लगता है कि जो मेरे पास आज है उसकी कद्र अभी से करनी चाहिए। यह आदत कैसे विकसित करूँ?

श्लोक

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।5।।

uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet ātmaiva hyātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ

श्रीमद्भगवद्गीता · 6.5

चौपाई / दोहा

सकल पदारथ हैं जग माहीं। करमहीन नर पावत नाहीं॥

sakala padaratha hain jaga mahin, karamahina nara pavata nahin

अर्थ

संसार में सब कुछ उपलब्ध है, पर कर्म से विमुख व्यक्ति उसे पा नहीं सकता। हाथ चलेंगे तो रास्ता भी चलेगा।

श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड

कथा

बुद्ध का पहला उपदेश: जब हम अपने दुःख को समझना शुरू करते हैं

बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त करने के बाद बुद्ध ने अपनी यात्रा अकेले जारी नहीं रखी।

वे सारनाथ पहुंचे।

वहां उनके पांच पुराने साथी तपस्वी रहते थे।

कभी वे बुद्ध के साथ कठोर तपस्या करते थे, लेकिन जब बुद्ध ने अत्यधिक तप छोड़कर संतुलित मार्ग अपनाया, तो वे उनसे अलग हो गए थे।

अब बुद्ध उन्हीं के पास लौटे।

यहीं उन्होंने अपना पहला उपदेश दिया, जिसे धम्मचक्कपवत्तन सुत्त के नाम से जाना जाता है।

बुद्ध ने कोई बहुत जटिल बात नहीं शुरू की।

उन्होंने जीवन के एक ऐसे अनुभव से शुरुआत की जिसे हर इंसान किसी किसी रूप में जानता है—

दुःख।

उन्होंने समझाया कि जीवन में दुःख है।

फिर उन्होंने उससे भी महत्वपूर्ण सवाल पूछा—

दुःख आता क्यों है?

बौद्ध परंपरा में इसका एक प्रमुख उत्तर तृष्णा और आसक्ति से जुड़ा है—हम चाहते हैं कि चीजें हमारी इच्छा के अनुसार हों, लेकिन जीवन हमेशा हमारी इच्छा के अनुसार नहीं चलता।

फिर बुद्ध ने कहा कि दुःख से मुक्ति संभव है।

और उसके लिए एक मार्ग है—आर्य अष्टांगिक मार्ग।

सही दृष्टि।

सही संकल्प।

सही वाणी।

सही कर्म।

सही आजीविका।

सही प्रयास।

सही स्मृति।

सही समाधि।

इसे उन्होंने अति भोग और अति कठोर तपस्या के बीच मध्यम मार्ग के रूप में रखा।

इस कहानी की सबसे मानवीय बात शायद यही है कि बुद्ध ने दुःख को देखकर सिर्फ यह नहीं कहा—

"दुःख मत करो।

"

उन्होंने पहले पूछा—

"दुःख को समझो।

"

हम भी अक्सर यही गलती करते हैं।

दुखी हैं तो तुरंत खुद को व्यस्त कर लेते हैं।

अकेले हैं तो फोन उठा लेते हैं।

रिश्ता टूटा है तो किसी और रिश्ते में भाग जाते हैं।

असफल हुए हैं तो खुद को दोष देने लगते हैं।

लेकिन कभी-कभी रुककर यह देखना जरूरी होता है—

मुझे वास्तव में दुख किस बात का है?

मेरी इच्छा पूरी नहीं हुई?

मुझे किसी ने छोड़ दिया?

मुझे वह सम्मान नहीं मिला जिसकी मुझे उम्मीद थी?

या मैं उस चीज को स्वीकार नहीं कर पा रहा हूं जिसे बदलना मेरे हाथ में ही नहीं है?

Linked wisdom: Dhammachakkappavattana Sutta — foundational Buddhist teaching, Pali Canon; precise Pali verse-level citation pending | Evidence: scriptural (core teaching, pending precise canonical citation) | Topics: दुःख, दुख क्यों, जीवन का अर्थ

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “कई चीजों की कीमत मुझे तब समझ आई जब वे मेरे पास नहीं रहीं---किसी अपने का साथ, घर का माहौल या जिंदगी की छोटी-छोटी सुविधाएं।

अब लगता है कि जो मेरे पास आज है उसकी कद्र अभी से करनी चाहिए।

यह आदत कैसे विकसित करूँ?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है संसार में सब कुछ उपलब्ध है, पर कर्म से विमुख व्यक्ति उसे पा नहीं सकता।

हाथ चलेंगे तो रास्ता भी चलेगा।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है दुःख से तुरंत भागना जरूरी नहीं।

कभी-कभी दुःख को ध्यान से देखने पर उसके पीछे छिपी हमारी इच्छा, डर या अपेक्षा दिखाई देने लगती है।

और जब कारण थोड़ा साफ होता है, तब रास्ता भी थोड़ा साफ होने लगता है।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

दुःख से तुरंत भागना जरूरी नहीं। कभी-कभी दुःख को ध्यान से देखने पर उसके पीछे छिपी हमारी इच्छा, डर या अपेक्षा दिखाई देने लगती है। और जब कारण थोड़ा साफ होता है, तब रास्ता भी थोड़ा साफ होने लगता है।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक