यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है
सुबह उठकर काम शुरू करने का मन नहीं करता। खुद को समझाता हूँ कि बस आज कर लो, लेकिन अगले दिन फिर वही स्थिति होती है। मैं किसी बड़ी उपलब्धि की नहीं, बस रोजमर्रा के काम के लिए भी उत्साह कैसे वापस लाऊँ?
श्लोक
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।5।।
uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet ātmaiva hyātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ
श्रीमद्भगवद्गीता · 6.5
चौपाई / दोहा
सकल पदारथ हैं जग माहीं। करमहीन नर पावत नाहीं॥
sakala padaratha hain jaga mahin, karamahina nara pavata nahin
अर्थ
संसार में सब कुछ उपलब्ध है, पर कर्म से विमुख व्यक्ति उसे पा नहीं सकता। हाथ चलेंगे तो रास्ता भी चलेगा।
श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड
कथा
भीम और बकासुर: जब किसी की मदद करने के लिए आगे आना पड़े
वनवास के दौरान पांडव एकचक्रा नाम के नगर में रह रहे थे।
वे अपनी पहचान छिपाकर एक साधारण परिवार के यहां ठहरे हुए थे।
एक दिन कुंती ने उस घर में रोने की आवाज सुनी।
उन्होंने पूछा तो पता चला कि पूरा नगर बकासुर नाम के राक्षस से परेशान था।
कथा के अनुसार नगर के लोगों को बारी-बारी से भोजन और एक व्यक्ति उसके पास भेजना पड़ता था।
अगर ऐसा नहीं किया जाता, तो वह पूरे नगर को नुकसान पहुंचाने की धमकी देता था।
उस दिन उस परिवार की बारी थी।
घर में हर कोई परेशान था।
किसे भेजें?
पिता जाएं?
मां जाए?
बेटा जाए?
कोई भी फैसला लेने को तैयार नहीं था।
कुंती ने उनकी परेशानी सुनी।
फिर उन्होंने कहा कि उनके पुत्रों में से एक यह काम कर देगा।
भीम आगे आए।
उन्होंने डरकर पीछे हटने के बजाय जाने का फैसला किया।
वह भोजन से भरी गाड़ी लेकर बकासुर के पास पहुंचे।
कथा के अनुसार रास्ते में उन्होंने भोजन खुद खाना शुरू कर दिया।
बकासुर आया तो दोनों के बीच युद्ध हुआ।
भीम ने उसका सामना किया और अंततः उसका वध कर दिया।
नगर उस भय से मुक्त हो गया।
लेकिन जिस बात पर ध्यान देना चाहिए, वह यह है कि भीम ने यह काम प्रसिद्धि के लिए नहीं किया।
उन्होंने किसी मंच पर जाकर नहीं कहा — "देखो, मैंने तुम्हें बचाया।
"
वे अपनी पहचान छिपाकर ही वहां से चले गए।
हमारे जीवन में भी कभी-कभी कोई ऐसा व्यक्ति हमारे सामने आता है जिसे मदद की जरूरत होती है।
कोई सहकर्मी मुश्किल में है।
किसी पड़ोसी की समस्या है।
परिवार में कोई अकेला पड़ गया है।
हम सोचते हैं — "मैं क्यों बीच में पड़ूं?
"
लेकिन हर बार मदद करने का मतलब बड़ी चीज करना नहीं होता।
कभी किसी के लिए खड़ा होना ही पर्याप्त होता है।
महाभारत · Linked wisdom: Mahabharata, Adi Parva — citation-level verification required | Evidence: traditional | Topics: साहस, सुरक्षा, सेवा
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “सुबह उठकर काम शुरू करने का मन नहीं करता।
खुद को समझाता हूँ कि बस आज कर लो, लेकिन अगले दिन फिर वही स्थिति होती है।
मैं किसी बड़ी उपलब्धि की नहीं, बस रोजमर्रा के काम के लिए भी उत्साह कैसे वापस लाऊँ?
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — संसार में सब कुछ उपलब्ध है, पर कर्म से विमुख व्यक्ति उसे पा नहीं सकता।
हाथ चलेंगे तो रास्ता भी चलेगा।
इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है — मदद की असली कीमत तब पता चलती है जब उसके बदले में हमें कुछ नहीं चाहिए।
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।
इस अनुभव से एक बात सामने आती है
मदद की असली कीमत तब पता चलती है जब उसके बदले में हमें कुछ नहीं चाहिए।
ऐसे ही कुछ और अनुभव
- “पहले किसी नई जगह जाने, कुछ नया सीखने या दोस्तों के साथ कोई योजना बनाने की बात सुनकर ही उत्साह आ जाता था। अब कई चीजें सामने आती हैं लेकिन मन कहता है, रहने दो। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मेरे अंदर का वह उत्साह कहाँ चला गया।”
- “हालात लगातार खराब हो रहे हैं। पैसे की चिंता है, घर में भी सब कुछ ठीक नहीं चल रहा और कई बार लगता है कि अब कुछ अच्छा होने वाला ही नहीं है। फिर भी अंदर कहीं एक छोटी-सी उम्मीद बची रहती है। क्या यह उम्मीद रखना सही है या मैं खुद को धोखा दे रहा हूँ?”
क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
