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मेरी कुछ ऐसी कमजोरियां हैं जिन्हें मैं जानता हूँ, लेकिन उन्हें स्वीकार करते ही लगता है कि मैं हार मान रहा हूँ। मैं खुद को सुधारना भी चाहता हूँ और खुद से नफरत भी नहीं करना चाहता। क्या खुद को स्वीकार करना और खुद को बदलना दोनों साथ संभव हैं?
श्लोक
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।62।।
dhyāyato viṣhayān puṁsaḥ saṅgas teṣhūpajāyate saṅgāt sañjāyate kāmaḥ kāmāt krodho 'bhijāyate
श्रीमद्भगवद्गीता · 2.62
चौपाई / दोहा
बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥
binu satasanga bibeka na hoi, Rama kripa binu sulabha na soi
अर्थ
सत्संग के बिना विवेक नहीं जागता। उलझन में अकेले मत बैठिए — सच्चे लोगों का साथ ही रास्ता खोलता है।
श्रीरामचरितमानस · बालकाण्ड
कथा
शबरी: जब इंतज़ार सिर्फ इंतज़ार नहीं रहता
शबरी के जीवन की सबसे बड़ी कहानी शायद यही थी कि वह इंतजार करती रहीं।
उनके गुरु मतंग ऋषि ने उन्हें विश्वास दिया था कि एक दिन श्रीराम उनके आश्रम आएंगे।
गुरु चले गए।
समय बीत गया।
आश्रम में रहने वाले दूसरे लोग धीरे-धीरे चले गए।
लेकिन शबरी वहीं रहीं।
हर सुबह वह आश्रम के आसपास सफाई करतीं।
रास्ता साफ करतीं।
सोचतीं —
"शायद आज राम आएं।
"
वह जंगल से बेर चुनकर लातीं।
हर बेर को चखकर देखतीं कि कौन सा मीठा है और कौन सा नहीं।
उनका मन था कि अगर राम आएं, तो उन्हें सबसे अच्छे बेर खिलाऊंगी।
साल बीत गए।
उम्र बढ़ती गई।
लेकिन उनका इंतजार खत्म नहीं हुआ।
फिर एक दिन राम और लक्ष्मण सचमुच वहां पहुंचे।
सीता की खोज में भटकते हुए वे शबरी के आश्रम तक आए।
शबरी की खुशी की कल्पना करना भी मुश्किल है।
जिस व्यक्ति का इंतजार उन्होंने वर्षों तक किया था, वह आखिर उनके सामने था।
उन्होंने अपने बेर राम को दिए।
परंपरा में यह प्रसंग बहुत प्रेम से याद किया जाता है — शबरी के प्रेम को राम ने महत्व दिया।
मुझे इस कहानी में सबसे खूबसूरत बात यह लगती है कि शबरी सिर्फ बैठकर इंतजार नहीं करती थीं।
वह हर दिन तैयारी करती थीं।
रास्ता साफ करती थीं।
बेर चुनती थीं।
आश्रम संभालती थीं।
यानी उम्मीद उनके लिए निष्क्रिय इंतजार नहीं थी।
Linked wisdom: Valmiki Ramayana / Ramcharitmanas — Shabari episode; needs citation-level verification | Evidence: traditional | Topics: अकेलापन, आस्था, प्रतीक्षा
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “मेरी कुछ ऐसी कमजोरियां हैं जिन्हें मैं जानता हूँ, लेकिन उन्हें स्वीकार करते ही लगता है कि मैं हार मान रहा हूँ।
मैं खुद को सुधारना भी चाहता हूँ और खुद से नफरत भी नहीं करना चाहता।
क्या खुद को स्वीकार करना और खुद को बदलना दोनों साथ संभव हैं?
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — सत्संग के बिना विवेक नहीं जागता।
उलझन में अकेले मत बैठिए — सच्चे लोगों का साथ ही रास्ता खोलता है।
इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है — जिस चीज़ का मैं इंतजार कर रहा हूं, उसके लिए आज मैं क्या कर रहा हूं — यह सवाल भी उतना ही जरूरी है।
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।
इस अनुभव से एक बात सामने आती है
जिस चीज़ का मैं इंतजार कर रहा हूं, उसके लिए आज मैं क्या कर रहा हूं — यह सवाल भी उतना ही जरूरी है।
ऐसे ही कुछ और अनुभव
- “जो हुआ उसे मैं बदल नहीं सकता, यह बात दिमाग समझता है। लेकिन दिल बार-बार उसी जगह लौट जाता है---काश मैंने ऐसा किया होता, काश वह बात नहीं हुई होती। मैं अतीत को स्वीकार करना चाहता हूँ लेकिन समझ नहीं आता कि शुरुआत कहाँ से करूँ।”
- “हालात लगातार खराब हो रहे हैं। पैसे की चिंता है, घर में भी सब कुछ ठीक नहीं चल रहा और कई बार लगता है कि अब कुछ अच्छा होने वाला ही नहीं है। फिर भी अंदर कहीं एक छोटी-सी उम्मीद बची रहती है। क्या यह उम्मीद रखना सही है या मैं खुद को धोखा दे रहा हूँ?”
क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
