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यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है

मोक्ष का मतलब समझ में आता है, लेकिन यह रोज़मर्रा की जिंदगी जीते हुए एक आम इंसान के लिए क्यों जरूरी है, यह नहीं समझ आता।

श्लोक

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।66।।

sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śharaṇaṁ vraja ahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo mokṣhayiṣhyāmi mā śhuchaḥ

श्रीमद्भगवद्गीता · 18.66

चौपाई / दोहा

कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना॥ पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥ कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥ राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥

Kahi Reechhapati sunu Hanumana, ka chup sadhi raheu balawana. Pawan tanay bal pawan samana, budhi bibek bigyan nidhana. Kavan so kaaj kathin jag maahi, jo nahi hoi tat tumh pahi. Ram kaj lagi tav avatara, sunatahi bhayau parbatakara.

अर्थ

रीछराज जामवंत ने कहा — सुनो हनुमान! हे बलवान, तुम चुप क्यों बैठे हो? तुम पवनपुत्र हो, तुम्हारा बल पवन के समान है; तुम बुद्धि, विवेक और ज्ञान के भंडार हो। इस संसार में ऐसा कौन सा कठिन कार्य है जो तुमसे न हो सके? श्री रामजी के कार्य के लिए ही तुम्हारा अवतार हुआ है। यह सुनते ही हनुमानजी पर्वत के समान विशाल हो गए।

श्रीरामचरितमानस · Kishkindha Kand, Doha 30

कथा

सुदामा: जब गरीबी दोस्ती के सामने छोटी पड़ जाए

सुदामा के घर में पैसे नहीं थे।

पत्नी और बच्चे थे।

कई बार खाने तक की चिंता रहती थी।

एक दिन पत्नी ने कहा

"आपके बचपन के मित्र कृष्ण अब द्वारका के राजा हैं।

उनसे मिलने क्यों नहीं जाते?

"

सुदामा को यह बात अच्छी नहीं लगी।

किसी पुराने दोस्त से मिलने जाना अलग बात है।

मदद मांगने जाना अलग।

उन्हें डर था कि कहीं कृष्ण के सामने जाकर उन्हें अपने घर की गरीबी बतानी पड़े।

लेकिन घर की हालत देखकर आखिर वे निकल पड़े।

साथ में देने के लिए कुछ खास था भी नहीं।

पड़ोस से मिले थोड़े से चावल एक छोटी पोटली में बांध लिए।

द्वारका पहुंचकर सुदामा को अपने कपड़ों और अपनी हालत पर संकोच हुआ।

वे सोच रहे थे

"क्या मैं सच में इस राजमहल में जा सकता हूं?

"

लेकिन जैसे ही कृष्ण को पता चला कि सुदामा आए हैं, वे खुद उन्हें लेने दौड़ पड़े।

दो पुराने दोस्त मिले।

राजा और गरीब ब्राह्मण नहीं।

बस दो दोस्त।

कृष्ण ने सुदामा को गले लगाया।

उनके पैर धोए।

उनसे बातें कीं।

सुदामा अपने साथ लाई हुई छोटी-सी पोटली छिपाने लगे।

उन्हें शर्म रही थी कि इतने बड़े राजा के सामने यह क्या लेकर आए हैं।

लेकिन कृष्ण ने उसे प्रेम से स्वीकार किया।

दोनों ने पुरानी बातें कीं।

हंसे।

बचपन याद किया।

सुदामा अपनी परेशानी पूरी तरह कह नहीं पाए।

फिर वे वापस लौट गए।

उन्हें लगा कि वे कुछ मांगकर नहीं आए।

लेकिन घर पहुंचने पर सब बदल चुका था।

जहां उनकी झोपड़ी थी, वहां समृद्धि थी।

पर कहानी का असली अर्थ महल नहीं है।

असली बात यह है कि सुदामा को अपने दोस्त के सामने अपनी गरीबी छिपाने की जरूरत नहीं थी।

सच्चे रिश्ते में हमेशा बराबरी पैसे से नहीं होती।

Linked wisdom: Srimad Bhagavatam, Canto 10; needs citation-level verification | Evidence: traditional | Topics: आर्थिक संकट, पैसे की तंगी, दोस्ती

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “मोक्ष का मतलब समझ में आता है, लेकिन यह रोज़मर्रा की जिंदगी जीते हुए एक आम इंसान के लिए क्यों जरूरी है, यह नहीं समझ आता।

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है रीछराज जामवंत ने कहा सुनो हनुमान!

हे बलवान, तुम चुप क्यों बैठे हो?

तुम पवनपुत्र हो, तुम्हारा बल पवन के समान है; तुम बुद्धि, विवेक और ज्ञान के भंडार हो।

इस संसार में ऐसा कौन सा कठिन कार्य है जो तुमसे हो सके?

श्री रामजी के कार्य के लिए ही तुम्हारा अवतार हुआ है।

यह सुनते ही हनुमानजी पर्वत के समान विशाल हो गए।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है कभी-कभी हमारी आर्थिक स्थिति हमें लोगों से दूर कर देती है।

हम सोचते हैं कि हमारे पास देने को कुछ नहीं है।

लेकिन रिश्ते हमेशा चीज़ों से नहीं चलते।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

कभी-कभी हमारी आर्थिक स्थिति हमें लोगों से दूर कर देती है। हम सोचते हैं कि हमारे पास देने को कुछ नहीं है। लेकिन रिश्ते हमेशा चीज़ों से नहीं चलते।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक