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यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है

निर्वाण की बातें सुनता हूँ, लेकिन क्या यह सिर्फ साधु-संतों के लिए है या एक सामान्य गृहस्थ जीवन जीने वाला भी इसे पा सकता है?

श्लोक

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्। सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।।28।।

dṛiṣhṭvemaṁ sva-janaṁ kṛiṣhṇa yuyutsuṁ samupasthitam sīdanti mama gātrāṇi mukhaṁ cha pariśhuṣhyati

श्रीमद्भगवद्गीता · 1.28

चौपाई / दोहा

होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तरक बढ़ावै साखा॥

hoihi soi jo Rama rachi rakha, ko kari tarka badhavai sakha

अर्थ

जो होना राम ने रच रखा है, वही होगा — व्यर्थ के तर्कों से केवल उलझन बढ़ती है। मन को इस भरोसे में टिकाना ही शांति का पहला कदम है।

श्रीरामचरितमानस · बालकाण्ड

कथा

मार्कण्डेय: जब मृत्यु का डर सामने हो

मार्कण्डेय के बारे में बचपन से ही कहा गया था कि उनकी आयु केवल सोलह वर्ष की होगी।

कल्पना कीजिए।

जब दूसरे बच्चे भविष्य के बारे में सपने देख रहे हों, तब आपको पता हो कि आपकी जिंदगी बहुत छोटी है।

उनके माता-पिता भी इस बात से दुखी थे।

लेकिन मार्कण्डेय ने अपने जीवन को सिर्फ डर के हवाले नहीं किया।

जैसे-जैसे सोलहवां वर्ष करीब आया, उनकी शिव भक्ति और गहरी होती गई।

फिर वह दिन आया।

मार्कण्डेय शिवलिंग के सामने बैठे थे।

और तभी यमराज उनके सामने प्रकट हुए।

मृत्यु सामने थी।

कहानी के अनुसार, मार्कण्डेय ने शिवलिंग को पकड़ लिया।

यमराज ने अपना पाश फेंका।

पाश शिवलिंग को भी छू गया।

और फिर भगवान शिव प्रकट हुए।

मार्कण्डेय बच गए और उन्हें दीर्घ जीवन का वरदान मिला।

इस कथा को चाहे जिस रूप में समझें, इसमें एक बहुत मानवीय बात है।

डर के कारण जिंदगी रोक देना और मृत्यु की वास्तविकता को स्वीकार करके आज को अर्थपूर्ण बनाना दोनों अलग बातें हैं।

हममें से बहुत लोग भविष्य की चिंता में आज का दिन खो देते हैं।

"अगर बीमारी हो गई तो?

"

"अगर कुछ हो गया तो?

"

"अगर मैं मर गया तो?

"

इन सवालों का कोई अंत नहीं।

मार्कण्डेय की कहानी हमें यह नहीं कहती कि मृत्यु के बारे में कभी मत सोचो।

वह हमें यह सोचने देती है

जब मृत्यु निश्चित है, तब आज कैसे जीना है?

Linked wisdom: Markandeya Purana / Shiva Purana — needs citation-level verification | Evidence: traditional | Topics: मृत्यु का भय, आस्था, स्वास्थ्य संकट

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “निर्वाण की बातें सुनता हूँ, लेकिन क्या यह सिर्फ साधु-संतों के लिए है या एक सामान्य गृहस्थ जीवन जीने वाला भी इसे पा सकता है?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है जो होना राम ने रच रखा है, वही होगा व्यर्थ के तर्कों से केवल उलझन बढ़ती है।

मन को इस भरोसे में टिकाना ही शांति का पहला कदम है।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है भविष्य हमारे हाथ में पूरी तरह नहीं है।

लेकिन आज का दिन किस तरह जीना है, यह कुछ हद तक हमारे हाथ में है।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

भविष्य हमारे हाथ में पूरी तरह नहीं है। लेकिन आज का दिन किस तरह जीना है, यह कुछ हद तक हमारे हाथ में है।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक