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जब जिंदगी में सब कुछ अच्छा चल रहा होता है, तब श्रद्धा आसान लगती है। लेकिन मुश्किल समय में वही श्रद्धा डगमगाने लगती है। ऐसा क्यों?

श्लोक

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।63।।

krodhād bhavati sammohaḥ sammohāt smṛiti-vibhramaḥ smṛiti-bhranśhād buddhi-nāśho buddhi-nāśhāt praṇaśhyati

श्रीमद्भगवद्गीता · 2.63

चौपाई / दोहा

मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥

moha sakala byadhinha kara mula, tinha te puni upajahin bahu shula

अर्थ

मोह ही सब रोगों की जड़ है, उसी से अनेक पीड़ाएँ जन्म लेती हैं। पकड़ ढीली होते ही दुःख हल्का होने लगता है।

श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड

कथा

तत् त्वम् असि: जब श्वेतकेतु को समझ आया कि ज्ञान सिर्फ जानना नहीं है

श्वेतकेतु बारह वर्षों तक गुरुकुल में पढ़कर अपने पिता उद्दालक के पास लौटे।

उन्होंने बहुत कुछ सीखा था।

वेद पढ़े थे।

शास्त्र पढ़े थे।

ज्ञान अर्जित किया था।

और उन्हें अपने ज्ञान पर गर्व भी था।

पिता ने उन्हें देखकर एक अलग तरह का सवाल पूछा—

"क्या तुमने वह जाना है, जिसे जान लेने पर बाकी सबको जानने की दिशा समझ में जाए?

"

श्वेतकेतु चुप हो गए।

इतना पढ़ने के बाद भी वे इस सवाल का जवाब नहीं दे पाए।

तब उद्दालक ने उन्हें समझाना शुरू किया।

उन्होंने मिट्टी का उदाहरण दिया।

मिट्टी का एक टुकड़ा जान लेने पर मिट्टी से बने बहुत से बर्तनों का मूल समझा जा सकता है।

नाम अलग हैं, आकार अलग हैं, लेकिन मूल तत्व एक है।

फिर सोने का उदाहरण आया।

फिर नदियों का समुद्र में मिल जाना।

फिर छोटे से बीज के भीतर छिपे विशाल वृक्ष की संभावना।

धीरे-धीरे श्वेतकेतु समझने लगे कि बाहरी रूप अलग-अलग दिखाई दे सकते हैं, लेकिन उनके पीछे कोई गहरी एकता हो सकती है।

तब उद्दालक ने वह प्रसिद्ध वाक्य कहा—

"तत् त्वम् असि" वह तुम हो।

यह सिर्फ एक वाक्य नहीं था।

यह श्वेतकेतु की पूरी सोच को भीतर से बदलने वाला बोध था।

हम भी अपनी पहचान कितनी चीजों से जोड़ लेते हैं।

मैं डॉक्टर हूं।

मैं शिक्षक हूं।

मैं व्यापारी हूं।

मैं सफल हूं।

मैं असफल हूं।

मैं किसी का बेटा हूं।

मैं किसी की पत्नी हूं।

मैं किसी का पिता हूं।

लेकिन अगर ये सारी भूमिकाएं एक दिन बदल जाएं तो?

तब बचता कौन है?

शायद यही वह सवाल है जिसके सामने श्वेतकेतु को खड़ा किया गया था।

उपनिषद् · Linked wisdom: तत् त्वम् असि — Chandogya Upanishad 6.8.7 | Evidence: scriptural (mantra); traditional (narrative frame) | Topics: आत्मिक खोज, मैं कौन हूं

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “जब जिंदगी में सब कुछ अच्छा चल रहा होता है, तब श्रद्धा आसान लगती है।

लेकिन मुश्किल समय में वही श्रद्धा डगमगाने लगती है।

ऐसा क्यों?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है मोह ही सब रोगों की जड़ है, उसी से अनेक पीड़ाएँ जन्म लेती हैं।

पकड़ ढीली होते ही दुःख हल्का होने लगता है।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है हमारी पहचान सिर्फ हमारी नौकरी, पैसा, रिश्ते या उपलब्धियां नहीं हैं।

अपने बारे में गहराई से पूछना भी जीवन की एक महत्वपूर्ण यात्रा है।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

हमारी पहचान सिर्फ हमारी नौकरी, पैसा, रिश्ते या उपलब्धियां नहीं हैं। अपने बारे में गहराई से पूछना भी जीवन की एक महत्वपूर्ण यात्रा है।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक