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गहरी नींद में न कोई विचार होता है, न कोई सपना, फिर भी सुबह उठकर लगता है कि आराम मिला। उस अवस्था में असल में क्या होता है?
श्लोक
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।20।।
na jāyate mriyate vā kadāchin nāyaṁ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ ajo nityaḥ śhāśhvato 'yaṁ purāṇo na hanyate hanyamāne śharīre
श्रीमद्भगवद्गीता · 2.20
चौपाई / दोहा
जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥
jehi ken jehi para satya sanehu, so tehi milai na kachhu sandehu
अर्थ
जिसका जिस पर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है — इसमें संदेह नहीं। सच्चा प्रेम कभी व्यर्थ नहीं जाता।
श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड
कथा
किसा गौतमी: जब अपना दुःख दुनिया से बड़ा लगने लगे
किसा गौतमी का छोटा बच्चा मर गया।
इतना बड़ा दुःख था कि वह इस सच्चाई को स्वीकार ही नहीं कर पा रही थीं।
वे अपने बच्चे को गोद में लेकर घर-घर जाती रहीं।
लोगों ने समझाया कि बच्चा अब नहीं रहा।
लेकिन मां का मन यह मानने के लिए तैयार नहीं था।
उनके लिए उस समय दुनिया में सबसे महत्वपूर्ण सिर्फ एक बात थी —
"मेरे बच्चे को वापस कैसे बचाया जाए?
"
किसी ने उन्हें बुद्ध के पास जाने की सलाह दी।
वह अपने बच्चे को लेकर बुद्ध के पास पहुंचीं और उनसे कोई ऐसी औषधि मांगी जिससे बच्चा फिर जीवित हो जाए।
बुद्ध ने उन्हें तुरंत यह नहीं कहा कि "मृत्यु जीवन का नियम है।
"
उन्होंने उन्हें एक काम दिया।
उन्होंने कहा कि एक मुट्ठी सरसों के दाने लेकर आओ।
लेकिन एक शर्त थी —
वे दाने ऐसे घर से होने चाहिए जहां कभी किसी की मृत्यु न हुई हो।
किसा गौतमी उम्मीद लेकर निकल पड़ीं।
पहले घर में सरसों मिल सकती थी।
लेकिन जब उन्होंने पूछा — "क्या इस घर में कभी किसी की मृत्यु हुई है?
"
जवाब मिला — हां।
दूसरे घर गईं।
वहां भी किसी ने पिता खोया था।
कहीं मां।
कहीं बच्चा।
कहीं पति।
हर घर में कोई न कोई कहानी थी।
धीरे-धीरे किसा को समझ आने लगा कि जिस दुःख को वह केवल अपना दुःख समझ रही थीं, वह मनुष्य के जीवन का हिस्सा है।
उन्हें कोई ऐसा घर नहीं मिला जहां मृत्यु कभी आई ही न हो।
उनका दुःख उसी क्षण खत्म नहीं हुआ।
बच्चा वापस नहीं आया।
लेकिन उनके दुःख के साथ एक और चीज जुड़ गई — समझ।
अब वह अकेली नहीं थीं।
उन्हें पता चल गया था कि दुनिया में हर घर के भीतर कोई न कोई अपना दुःख लेकर जी रहा है।
मुझे इस कहानी की यही बात सबसे सच्ची लगती है।
जब हमारा कोई अपना चला जाता है, तो हमें लगता है —
"मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ?
"
और सच यह है कि कोई भी जवाब उस दर्द को तुरंत खत्म नहीं कर सकता।
किसा गौतमी की कहानी भी दुःख मिटाने का कोई तरीका नहीं देती।
वह बस यह दिखाती है कि दुःख को स्वीकार करने की शुरुआत कभी-कभी तब होती है जब हमें एहसास होता है कि हम इस अनुभव में अकेले नहीं हैं।
Linked wisdom: Kisa Gotami parable — specific canonical verse citation pending | Evidence: traditional / Buddhist narrative tradition | Topics: प्रियजन की मृत्यु, प्रियजन का खोना, दुःख
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “गहरी नींद में न कोई विचार होता है, न कोई सपना, फिर भी सुबह उठकर लगता है कि आराम मिला।
उस अवस्था में असल में क्या होता है?
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — जिसका जिस पर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है — इसमें संदेह नहीं।
सच्चा प्रेम कभी व्यर्थ नहीं जाता।
इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है — दुःख को तुरंत खत्म करना जरूरी नहीं।
पहले उसे स्वीकार करना भी एक रास्ता है।
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।
इस अनुभव से एक बात सामने आती है
दुःख को तुरंत खत्म करना जरूरी नहीं। पहले उसे स्वीकार करना भी एक रास्ता है।

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क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
