यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है
कभी-कभी मुझे एहसास होता है कि मेरा अहंकार ही मेरे कई दुखों की जड़ है, फिर भी इसे पहचानना और छोड़ना बहुत मुश्किल लगता है।
श्लोक
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।7।।
yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata abhyutthānam adharmasya tadātmānaṁ sṛjāmyaham
श्रीमद्भगवद्गीता · 4.7
चौपाई / दोहा
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥
kadara mana kahun eka adhara, daiva daiva alasi pukara
अर्थ
कायर और आलसी मन का एक ही सहारा होता है — भाग्य को दोष देना। साहस कर्म से आता है, प्रतीक्षा से नहीं।
श्रीरामचरितमानस · बालकाण्ड
कथा
ध्रुव: जब किसी ने कहा, "तुम्हारी जगह यहां नहीं है"
ध्रुव सिर्फ पांच साल का था।
एक दिन वह अपने पिता राजा उत्तानपाद की गोद में बैठना चाहता था।
बच्चे के लिए इससे ज्यादा सामान्य बात क्या होगी?
लेकिन उसकी सौतेली मां सुरुचि ने उसे रोक दिया।
उन्होंने कहा कि वह राजा की गोद में तभी बैठ सकता है जब वह उनके गर्भ से जन्मा होता।
एक छोटे बच्चे के लिए यह बात बहुत गहरी चोट थी।
ध्रुव रोते हुए अपनी मां सुनीति के पास गया।
मां ने उसके दुख को समझा।
उन्होंने उसे बदला लेने के लिए नहीं कहा।
उन्होंने उसे यह भी नहीं कहा कि "कुछ हुआ ही नहीं।
"
उन्होंने उसके दर्द को एक दिशा दी।
अगर तुम्हें ऐसा स्थान चाहिए जो कोई तुमसे छीन न सके, तो उस स्थान को बाहर मत खोजो।
ध्रुव जंगल की ओर निकल पड़ा।
रास्ते में नारद मुनि मिले।
उन्होंने समझाया कि वह बहुत छोटा है और इतनी कठिन साधना उसके लिए आसान नहीं होगी।
लेकिन ध्रुव का मन तय कर चुका था।
नारद ने उसे मंत्र दिया —
"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
"
ध्रुव ने साधना शुरू की।
कहानी के अनुसार उसकी तपस्या इतनी गहरी हुई कि भगवान विष्णु उसके सामने प्रकट हुए।
ध्रुव ने जिस जगह के लिए शुरुआत में रोकर इच्छा की थी, उसे उससे कहीं बड़ा स्थान मिला।
ध्रुव तारा — स्थिर, अडिग।
यह कहानी सिर्फ धार्मिक चमत्कार की कहानी नहीं है।
एक पांच साल के बच्चे की चोट से शुरू हुई कहानी है।
उसे कहा गया —
"तुम यहां के नहीं हो।
"
और उसने उस वाक्य को अपनी पूरी पहचान नहीं बनने दिया।
Linked wisdom: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय — verified mantra tradition; narrative frame traditional | Evidence: scriptural for mantra; traditional for narrative | Topics: आत्मसंशय, अस्वीकृति, आत्मविश्वास
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “कभी-कभी मुझे एहसास होता है कि मेरा अहंकार ही मेरे कई दुखों की जड़ है, फिर भी इसे पहचानना और छोड़ना बहुत मुश्किल लगता है।
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — कायर और आलसी मन का एक ही सहारा होता है — भाग्य को दोष देना।
साहस कर्म से आता है, प्रतीक्षा से नहीं।
इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है — किसी की कही हुई बात मेरे बारे में अंतिम सत्य नहीं होती।
किसी ने मुझे ठुकराया है, इसका मतलब यह नहीं कि मैं मूल्यहीन हूं।
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।
इस अनुभव से एक बात सामने आती है
किसी की कही हुई बात मेरे बारे में अंतिम सत्य नहीं होती। किसी ने मुझे ठुकराया है, इसका मतलब यह नहीं कि मैं मूल्यहीन हूं।
ऐसे ही कुछ और अनुभव
क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
